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मेरूदंड (स्पाइन) की गंभीर समस्या से जूझ रहे चार मरीज़ों का वर्ल्ड स्पाइन डे से पूर्व फोर्टिस ग्रेटर नोएडा में किया गया सफल उपचार।

संवाददाता जे एस सिसोदिया

ग्रेटर नोएडा,16 अक्टूबर, 2026: वर्ल्ड स्पाइन डे के मौके पर फोर्टिस हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा ने स्पाइन की समस्या से जुड़े चार ऐसे जटिल मामलों का उल्लेख किया जो चलने-फिरने की आजादी और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिहाज से समय से बीमारी का पता लगाने, सर्जरी की विशेष तकनीकों और बहुआयामी देखभाल के महत्व को दर्शाते हैं। 16 से 44 वर्ष की आयु के मरीज़ों का उपचार स्कॉलियॉसिस सहित स्पाइन से संबंधित गंभीर विकारों से लेकर नसों पर अत्यधिक दबाव पड़ने जैसी गंभीर बीमारियों के लिए किया गया। डॉ. राजेश सुभाष मिश्रा, सलाहकार, ऑर्थोपेडिक्स और डॉ. कपिल खरे, सलाहकार, ऑर्थोपेडिक्स, फोर्टिस हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा और अलग-अलग विशेषज्ञता रखने वाली हॉस्पिटल की टीम के साथ-साथ डॉ. हिमांशु त्यागी, निदेशक, ऑर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट के नेतृत्व में देखे जा रहे ये मामले स्पाइन की गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए तेज़ी से बढ़ते उपलब्ध विकल्पों को दर्शाते हैं।

पहले दो मामले कुशीनगर के 20 वर्षीय श्री सिद्धार्थ सिंह और नोएडा की 16 वर्षीय सुश्री राधिका चंदेला के हैं। ये दोनों ही स्कॉलियॉसिस से पीड़ित हैं जिसमें स्पाइन यानी रीढ़ की हड्डी एक ओर मुड़ जाती है और पीछे से देखने पर अक्सर व्यक्ति अंग्रेजी के सी (C) या एस (S) की तरह दिखाई देता है। सिद्धार्थ की रीढ़ की हड्डी में गंभीर रूप से टेढ़ापन था और यह 72 डिग्री तक टेढ़ी थी, जबकि राधिका के डॉर्सोलंबर में विकृति थी जिससे उनकी पीठ के मझोले और निचले हिस्से के मिलने की जगह प्रभावित हो रही थी। इस वजह से उन्हें बहुत दर्द होती है।

व्यापक विश्लेषण और विभिन्न विशेषज्ञों से अनुमति मिलने के बाद दोनों मरीज़ों की जनरल एनेस्थीसिया के अंतर्गत स्कॉलियॉसिस को ठीक करने के लिए सर्जरी की गई। इस प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष रॉड और स्क्रू का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि रीढ़ के अलाइनमेंट को सुधारा जा सके, उसे स्थिर रखा जा सके और आग उसे टेढ़ा होने से रोका जा सके। ऑपरेशन के बाद की देखभाल के अंतर्गत खून चढ़ाना, टेलर ब्रेस की मदद से रीढ़ को सहारा देना और विशेषज्ञों की देखरेख में बेहतर होने में मदद करना शामिल है। सर्जरी के बाद दोनों ही मरीज़ों ने चलना शुरू कर दिया और रिकवरी के दौरान उनकी तबियत में लगातार सुधार हो रहा है।

तीसरा मामला दिल्ली के 44 वर्षीय श्री जतिन त्यागी का था जिनके गर्दन में रीढ़ की हड्डी के बीच की डिस्क खिसक गई थी। इस वजह से उनकी नसों पर दबाव पड़ रहा था और उनके बाएं हाथ में बहुत तेज दर्द हो रहा था और उनका हाथ सुन्न भी हो जा रहा था। शुरुआत में रीढ़ को स्थिरता देने और आईसीयू में देखभाल के बाद उनकी एंटेरियर सर्वाइकल डिस्केक्टॉमी एंड फ्यूज़न (एसीडीएफ) की गई। गर्दन के अगले हिस्से में कट के माध्यम से की गई इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्रभावित डिस्क को हटाया गया, ताकि नसों पर पड़ने वाले दबाव से राहत मिल सके और रीढ़ की हड्डियों के आपस में जुड़ाव और स्थिरता को सहारा देने के लिए केज, प्लेट, स्क्रू और बोन ग्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया। सर्जरी के बाद उन्हें हाथ में हो रहे दर्द से तुरंत राहत मिली और हाथ सुन्न होने की समस्या भी ठीक हो गई। इसके बाद जतिन खड़े होने लगे और अगले दिन से उन्होंने चलना भी शुरू कर दिया।

चौथा मामला आगरा के 30 वर्षीय श्री गौतम का था जिन्हें पीठ के निचले हिस्से में गंभीर दर्द था जो उनके बाएं पैर तक जा रहा था जिससे सुन्नपन और झनझनाहट की समस्या हो रही थी। इन लक्षणों की वजह से वह पांच मिनट से ज़्यादा चल-फिर पाने में सक्षम नहीं थे। डॉक्टरों ने एक छोटे से कट से एंडोस्कोपिक डिस्केक्टॉमी की जो कम से कम नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया है। इसके अलावा, उनका हाई-डेफिनिशन एंडोस्कोप भी किया गया, ताकि नस पर दबाव डालने वाले डिस्क के हिस्से को निकाला जा सके और आसपास के टिश्यू को कम से कम नुकसान पहुंचे। इस प्रक्रिया के बाद, उनकी समस्या में सुधार हुआ और कुछ दिनों बाद ही डिस्चार्ज होने से पहले उन्होंने चलना शुरू कर दिया।

डॉ. हिमांशु त्यागी, निदेशक, ऑर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट, फोर्टिस हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा ने कहा, “स्पाइन में होने वाली समस्या से चलने-फिरने की क्षमता, आज़ादी और जीवन की गुणवत्ता बहुत बुरी तरह प्रभावित होती है, चाहे मामला किसी युवा में स्कॉलियॉसिस की समस्या का हो या नसों पर दबाव की वजह से गंभीर दर्द और परेशानी का सामना कर रहे किसी वयस्क व्यक्ति का। ऐसी समस्याओं को ठीक करने के लिए की जाने वाली सर्जरी और कम से कम नुकसान पहुंचाने वाली तकनीकों में हुए सुधारों से हमें हर मरीज़ की स्थिति और ज़रूरतों के हिसाब से उपचार तय करने में मदद मिली है। सर्जिकल प्रयासों के साथ ही व्यक्तिगत फॉलो-अप और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में सुधार को गति देना भी रिकवरी के लिए बहुत जरूरी है। वर्ल्ड स्पाइन डे, समय से बीमारी का पता लगाने और विशेषज्ञ देखभाल पर जोर देने का अवसर है, ताकि मरीज़ों को फिर से चलने-फिरने और अपनी हर दिन की गतिविधियां फिर से शुरू करने का मौका मिल सके।”

सुश्री बिंदु शर्मा, फेसिलिटी निदेशक, फोर्टिस हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा ने कहा, “इन चार मरीजों की तबियत में हुआ सुधार हमारी सर्जिकल, नर्सिंग और देखभाल टीमों के सामूहिक प्रयासों को दर्शाते हैं जिसमें इमरजेंसी मेडिसिन, गहन देखभाल, कार्डियोलॉजी, पल्मनोलॉजी, पीडियाट्रिक्स और इंटरनल मेडिसिन के विशेषज्ञ अलग-अलग क्लिनिकल ज़रूरतों के हिसाब से सहायता करते हैं। शुरुआती विश्लेषण और सर्जरी की तैयारी से लेकर ऑपरेशन के बाद की देखभाल तक, यह सहयोगात्मक रवैया देखभाल में निरंतरता को बनाए रखने में मदद करता है। हम स्पाइन के विशेष उपचार उपलब्ध कराने और रिकवरी के दौरान मरीज़ों और उनके परिवार के लोगों को सहायता पहुंचाने के प्रति प्रतिबद्ध बने रहेंगे।”

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